Common platform viewed by Swami Vivekananda at London in 1896

The science is in search of truth and gets many innovative concepts while discovering the truth. The spiritual masters or seers have already discovered the truth (supreme reality). Unless, they (scientist and spiritual master) exchange their views or findings in a scientific language, the benefit of both the domains will not be useful for human beings. A common platform is needed in the present era; for which Swami Vivekananda has given the sufficient explanations more than 150 years ago.

Swami Vivekananda delivered his talk at London in 1896 (ref. complete works of swami Vivekananda, volume II Chapter 6) where he talked about i) Materialism ii) Meaning of duality iii) How dualism affects the researcher? iv) How Advaita can encircle the religions? v) Need of universal religion vi) How Advaita viewed by Buddha? vii) Importance of Advaita and viii) how scientific concept and Vedanta are parallel or closer? About more than 150 years ago, Swami Ji has visualized the common platform for the scientists and also for the spiritual masters to have a dialogue and exchange their views.

The book written in English was translated in Hindi (for the benefit of Hindi speaking people) by Sri Naipal Singh ji who was Mechanical Engineer by Profession and presently social activist. The Book on “कॉमन प्लेटफार्म फॉर साइंस एंड स्प्रिचुअलिटीis published.

कॉमन प्लेटफार्म फॉर साइंस एंड स्प्रिचुअलिटी

1. परिचय

विज्ञान सदैव सत्य की तलाश में रहा है और सत्य की खोज करते समय कई नवीन अवधारणाएं प्राप्त करता रहा है । आध्यात्मिक गुरुओं और साधकों ने पहले ही सच्चाई खोज ली है। जब तक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक गुरु अपने विचारों का आदान-प्रदान नहीं करते, तब तक दोनों के ज्ञान-क्षेत्र का लाभ मनुष्यों के लिए उपयोगी नहीं होगा। वर्तमान युग में एक आम मंच की आवश्यकता है, जिसके लिए स्वामी विवेकानंद ने 150 वर्ष पहले पर्याप्त स्पष्टीकरण दिया है।

स्वामी विवेकानंद ने 1896 में लंदन में प्रस्तुत अपनी वार्ता में (स्वामी विवेकानंद खंड II अध्याय 6 के पूर्ण कार्यों का संदर्भ लें) :-i) भौतिकवाद ii) द्वैतवाद का अर्थ iii) पुनरावृत्ति को कैसे दोहराया? iv) कैसे अद्वैत धर्मों को घेर सकता है v) सार्वभौमिक धर्म की आवश्यकता vi) कैसे बुद्ध द्वारा अद्वैत को देखा जाता है? vii) अद्वैत का महत्व और vii) कैसे वैज्ञानिक अवधारणा और वेदांत समानांतर या करीब हैं? पर अपने विचार प्रस्तुत किये। 150 से अधिक वर्षों पहले स्वामीजी ने विज्ञानविदों के लिए आम मंच की कल्पना की है और अनुयायी स्वामी के लिए बातचीत करने और उनके विचारों का आदान-प्रदान करने के लिए भी विचार किया है।

2. भौतिकवाद

आम आदमी इसे वस्तु कहता है और धार्मिक लोग इसे भगवान कहते हैं। विश्वास एक ही है कि सब कुछ एक (भगवान या स्वर्ण से) आता है। इसका मतलब है कि आम लोगों के लिए स्वर्ण (लक्ष्मी) भगवान या ईश्वर है और धार्मिक लोगों के लिए भगवान किसी अन्य रूप में मनुष्य की तुलना में अधिक शक्ति रखते हैं। दोनों महाशक्ति की पहचान करते हैं और पूजा के प्रचलित साधनों से इसे प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

बुद्धवाद से पहले, भौतिकवाद “खाओ, पियो और आनंद लें” तक सीमित था । उनका मानना था कि कोई भगवान, आत्मा या स्वर्ग है ही नहीं क्योंकि धर्म को कुटिल विचार के रूप में लिया गया था और यह पुजारी से निकला था। ऐसा इसलिए है क्योंकि द्वैतवाद की अवधारणा बहुत विरोधाभासी हो गई और आम लोगों के लिए विश्लेषण बहुत स्पष्ट नहीं था। सनातन धर्म का पतन हो रहा था और जीवन को सभ्य तरीके से जीने के लिए कोई निर्धारित नियम संग्रह नहीं था। बुद्ध ने इस संघर्ष को महसूस किया है और वह आदर्श अवधारणा सामने आया जो आम पुरुषों और बौद्धिक वर्ग के लिए उपयुक्त था।जाति, भाषा, क्षेत्र और धर्म की सहायता से समाज में मतभेद पैदा करके भौतिकवाद फिर से अस्तित्व में आया।

जब बौद्ध धर्म (हिनायन और महायान अवधारणाओं) से कई शाखाएं विभाजित हुईं, तब जाति, भाषा, क्षेत्र और धर्म की सहायता से समाज में मतभेद पैदा करके भौतिकवाद फिर से अस्तित्व में आया। जाति, भाषा, क्षेत्र और धर्म के चार कारक जिम्मेदार हैं और अहंकार के लिए एक भोजन के रूप में काम करते हैं । आम तौर पर राजनीतिज्ञ मतदाता से वोट और प्रशंसा प्राप्त करने के स्वार्थ में औपचारिक रूप से इन कारकों का प्रयोग करते हैं ।

अहंकार मानसिक विकास के लिए विशेष रूप से बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास के लिए बाधा प्रतीत होता है। इसीलिए अधिकांश धर्म अहंकार को हटाने या कम करने पर जोर दे रहे हैं। जहां भी अहंकार केंद्रित धर्म या समाज या लोग मौजूद हैं वहां भौतिकवाद की वृद्धि होगी लेकिन बौद्धिक ज्ञानक्षेत्र का पतन होगा और समाज में उथल-पुथल होगी।

2.1 समाधान (भौतिकवाद के खिलाफ )

बौद्धिक विकास के बिना लोगों, समाज और देश की आर्थिक वृद्धि (समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए मन की उचित तर्कसंगतता रखने) में स्थिरता नहीं होगी। इसीलिए वैज्ञानिक विकास में अच्छी वृद्धि होने की बजाय दुनिया के लोगों को अशांति है। वैज्ञानिक विकास के साथ शिक्षित लोग अपने भावनात्मक मात्रात्मक (ईक्यू) की खोज नहीं कर रहे हैं; हालांकि उन्होंने अपने बौद्धिक अंश (आई क्यू) विकसित किए हैं। ई क्यू और आई क्यू के बीच इस असमानता के कारण भौतिकवादी मूल्य और नैतिक मूल्य के बीच एक अंतर है।

2.2 भौतिकवाद को कैसे हल करें

भौतिकवाद आर्थिक विकास बिंदु से बुरा नहीं है लेकिन यह एक बहुत ही स्वार्थी दृष्टिकोण की ओर जाता है यदि वही (भौतिकवाद) हर किसी में उपलब्ध छिपी दिव्यता द्वारा पोषित नहीं किया जाता है। आम तौर पर अत्यधिक भौतिकवादी समाज मूल्य प्रणाली से अलग हो जाता है जिसे संस्कृत में पुरुषार्थ भी कहा जाता है। यही कारण है कि यह उन्मूलन या न्यूनीकरण के लिए कई विचारकों का ध्यान आकर्षित करता है।

पश्चिमी दुनिया अथवा अन्यत्र मौजूद भौतिकवाद को समाप्त नही किया जा सकता क्योंकि इसके लिए उपयुक्त कारणो व विचार विमर्श की आवश्यकता है। इसके लिए तर्क संगत विश्लेषण की आवश्यकता है जो केवल अद्वैत द्वारा ही उपलब्ध हो सकता है। अद्वैत भौतिकवाद की अवधारणा को इस रूप में समझाने का प्रयास करता है कि इसको कैसे कम किया जा सकता है, उच्चतम नैतिकता को कैसे प्राप्त किया जा सकता है? स्वामी विवेकानंद के विचारो से स्पष्ट होता है कि अद्वैत वेदांत धरातल पर तो दोहरी विचारधारा वाला प्रतीत होता है जब कि वास्तव में ऐसा नहीं है।

2.3 अद्वैत, भौतिकवाद से कितना स्वतंत्र है?

हम कुछ हद तक भौतिकवादी हैं क्योंकि हम मानते हैं कि केवल “एक” ही है; लेकिन यह एक होने की अवधारणा सम्पूर्णता के दृष्टिकोण को पूरा करती है। अद्वैत वेदांत में हम मानते हैं कि हर किसी के लिए “एक ईश्वर” वास्तविकता है और यह अवधारणा ऊर्जा, अंतरिक्ष और चेतना के संयोजन से सम्पूर्णता के दृष्टिकोण को पूरा करती है। अद्वैत में व्यक्तिगत भगवान के लिए व्यक्तिगत भगवान की अवधारणा स्वार्थी दृष्टिकोण की ओर ले जाती है। जब कि एक “सर्वोच्च वास्तविकता “ की अद्वैत वेदांत अवधारणा हमें स्वार्थ भरे दृष्टिकोण से निःस्वार्थ दृष्टिकोण होने में बेवकूफ़ बनाती हैं।

3. द्वैतवाद का अर्थ

मनुष्यों की प्राकृतिक प्रवृत्ति जीवन के हर क्षेत्र में चलने के लिए सबसे आसान और सरल तरीके का पालन करना है। उदाहरण के लिए एक इमारत तक पहुंचने के लिए पगडंडी बनाई जाती है ताकि इमारत के सामने हरी घास का मैदान नष्ट न हो सके। लोगों की प्राकृतिक प्रवृत्ति रहती है कि वह बिल्डिंग तक पहुंचने के लिए वह पहले सरल उपाय का पालन करता है। इस तरह से लोग कुछ मिनट बचा सकते हैं लेकिन मैदान की सुंदरता को नष्ट करने का कारण बन जाते हैं। इसी तरह की घटनाएं जीवन के अन्य क्षेत्रों में होती रहती हैं।

मानव की कमजोरी सतह पर आ जाती है जब वे उपलब्ध समाधानों में से ऐसे समाधान को अपनाते है जो सरल उपाय वाला हो, सुविधाजनक हो जैसा कि सुंदर मैदान के विनाश में बताया गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि लोगों को सामान्य ज्ञान का सिद्धांत, जीवन के भौतिक और सुविधाजनक तरीके से निपटने का प्राकृतिक तरीका नही मानना चाहिए, लेकिन उन्हें दिन-प्रतिदिन जीवन में रहने के तर्कसंगत और विश्लेषणात्मक तरीके का एक और प्रतीक होना चाहिए।

अद्वैत भारत और दुनिया में मौजूद विभिन्न संप्रदायों के साथ कोई भेदभाव नहीं रखता है। आज द्वैतवाद मौजूद हैं और भारत और विदेशों में उनकी संख्या सबसे बड़ी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि द्वैतवादिता स्वाभाविक रूप से कम शिक्षित दिमाग के लिए अपील करता है। यह ब्रह्मांड का बहुत सुविधाजनक, प्राकृतिक, सामान्य ज्ञान वाला स्पष्टीकरण है।

ब्रह्मांड में सबसे पहले हम बुनियादी जरूरतों जैसे शरीर, शरीर को ढंकने और आराम के लिए संघर्ष करते हैं। जब मूल आवश्यकता पूरी हो जाती है तो हम बिजली, सड़क ,जलापूर्ति जैसे अन्य साधन की इच्छा रखते हैं।

इस सीमा तक स्वार्थी होने में कोई नुकसान नहीं। लेकिन हमें पर्यावरण, अर्थव्यवस्था, शिक्षा और सांस्कृतिक मूल्य जैसे अन्य क्षेत्रो के लिए कुछ करने के लिए भी अपने स्वार्थीपन को त्यागकर कुछ करना होगा ताकि हम वेद और बुद्ध – धर्म में दी गई अवधारणा को प्राप्त कर सकें। दुनिया एक घोंसले के समान है जहां ब्रह्मांड के विभिन्न हिस्सों में लोगों को जीवित रहना पड़ता है जैसा कि पक्षी प्रकृति के उपहार को नष्ट किए बिना घोंसला में सकुशल रहते हैं।

3.1 द्वैतवादी के साथ कोई झगड़ा नहीं

द्वैतवादी , अद्वैत की अवधारणा से दुखी रहता है और इसे तिरस्कारी समझता है। लेकिन अद्वैत दूसरे विचारो का भी सम्मान करता है और उससे किसी प्रकार का विरोध , झगड़ा होने का खंडन करता है और इस प्रकार सही रास्ते पर अग्रसर है। द्वैतवादी “ खाओ , पियो और मस्त रहो “ सिद्धांत को अपनाकर अपने जीवन को चलाने में आनंद का अनुभव करता है। यह दोहरा सिद्धांत समाज में अर्थ व्यवस्था और शिक्षा में संतुलन बनाकर विकास कर सकता है। इससे सामाजिक संरचना तो ठीक रहती है लेकिन स्थाई तोर पर नही। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मनुष्य की छिपी क्षमता का सम्पूर्ण विकास नही हो पाता; यद्यपि यह अवधारणा इस छिपी क्षमता में कुछ गति अवश्य प्रदान करता है।

इतिहास बताता है कि संसार में जब तक द्वैत अवधारणा की समाज पर गहरी पकड़ रही है तब तक अधिक वैज्ञानिक उन्नति नही हुई है। जब से भगवान् बुध ने “बुद्धवाद “ (अद्वैत वेदांता के समान ) का सिद्धांत दिया तभी से मानव का बौद्धिक विकास हुआ और तभी से वैज्ञानिक पुरुषो के चेहरे खिलने लगे।

3.2 द्वैतवादी की समान सोच

द्वैतवादी, एक मनुष्य के लिए एक ईश्वर अर्थात एकेश्वर वाद के विचार का अनुसरण करता है। इसका अर्थ हुआ कि व्यक्ति विशेष अथवा समाज के पास एक ईश्वर है। यह परिदृश्य गांव , शहर जहां मनुष्य दैनिक जीवन में किसी भगवान् विशेष में विश्वास करते है ,में अधिक प्रचलित है। वे “सर्वेश्वर वाद “ अर्थात एक ईश्वर सब जगह मौजूद होने के विचार को नही मानते। इसका तात्पर्य यह हुआ कि एक महाशक्ति (भगवान् ) जो सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान है , ब्रह्माण्ड के हर कण में विद्यमान है।

प्रत्येक मनुष्य अथवा समाज के लिए एक भगवान् होने से दूसरे समुदाय अथवा व्यक्ति से लगाव, ईर्ष्या, घृणा, पसंद या नापसंद की भावना उत्पन्न होती है और धार्मिक आंदोलन , उन्माद उत्पन्न होता है और यही राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय अशांति होने का प्रमुख कारण है।

दुनिया भर के द्वैतवादी व्यक्तिगत भगवान में विश्वास करते हैं जो पूर्णरूप से मानव स्वरूपी , इस संसार में एक महाराजा की तरह किसी से संतुष्ट , किसी से असंतुष्ट रहता है।

धार्मिक विश्वास के संबंध में दूसरों के साथ प्रतिस्पर्धा करना स्वाभाविक प्रक्रिया है। निश्चित रूप से विश्वास अंधविश्वास में बदल जाता है (भेदभाव की भावना के बिना) और लोग रूढ़िवादी बन जाते हैं। यह समाज , राष्ट्र व दुनिया की सदभावना , सामंजस्य को तोड़ देता है।

द्वैतवादी अपने भगवान को प्रबल और उसकी उत्पत्तियों को उपहार के रूप में मानते हैं। स्वाभाविक रूप से द्वैतवादी इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि उसके कुछ प्रिय होते हैं और उन प्रियो में से वह एक होने की आशा करता है। कुछ द्वैतवादी संकीर्णतावश यह भी सोचने लगते हैं कि जो भगवान के पक्ष में पूर्व निर्धारित है उन्हें ही बचाया जा सकता है तथा अन्य चाहे वे कितने भी परिश्रमी हो , को नही बचाया जा सकता। इस प्रकार की धारणा उचित वातारण प्रदान नही करती। यह धारणा संसार के लगभग सभी धार्मिक पंथो में पाई जाती है। धार्मिक गुरु अपने अनुयायियों की भावनात्मक कमजोरी का फायदा उठाते हैं और उन्हें इस तरह की धारणा में विश्वास दिलाते हैं।

द्वैतवादी धर्म आपस में झगड़ा , लड़ाई करते रहते हैं और कराते आए हैं। इतिहास साक्षी है कि संसार में जब भी खुनी संघर्ष, लड़ाई हुई हैं , उसका मुख्य कारण दो धर्मो के बीच की लड़ाई ही है। यदि अद्वैत अथवा बौद्ध संकल्पना का अनुसरण किया जाए तो विश्व-युद्ध का परिदृश्य ही समाप्त हो सकता है।

अशिक्षितों में व्याप्त घमंड के कारण ही द्वैतवादी लोकप्रिय होते हैं। द्वैतवादी सोचते हैं कि वे नैतिक नहीं हो सकते हैं जब तक उनके हाथ में एक छड़ी के साथ एक देवता दंडित करने के लिए तैयार न हो। इस परिदृश्य को दुनिया भर के अधिकांश धार्मिक कार्यो में देखा जा सकता है। यही कारण है कि जनसमूह “ईश्वर भय” भावना के साथ रहता है और नैतिक मूल्य को अपनाने का प्रयास करता है।

4. द्वैतवादी शोधकर्ता को कैसे प्रभावित करता है ?

बुनियादी शोधकर्ताओं विशेष रूप से वैज्ञानिकों को भावना मुक्त सोच की आवश्यकता होती है। द्वैतवादी दृष्टिकोण भावनाओं को बढ़ावा नहीं देता है बल्कि यह व्यक्तिगत और पारिवारिक आवश्यकताओं को प्राप्त करने के लिए मजबूती देता है।दूसरे शब्दों में एक व्यक्ति का स्वयं का और परिवार में स्वार्थरत विकास का भाव आना द्वैतवादी दृष्टिकोण से बहुत स्वाभाविक और सुविधाजनक है। शोधकर्ता को उनके दृष्टिकोण में पूर्ण एकाग्रता की आवश्यकता होती है, सोच की प्रक्रिया भावना से मुक्त होती है। शोधकर्ता को उनके उद्देश्य में पूर्ण एकाग्रता की आवश्यकता होती है, बशर्ते सोच की प्रक्रिया भावना से मुक्त होती है। जब तक यह हासिल नहीं किया जाता है तब तक शोधकर्ता की कुछ परिकल्पना पर एकाग्रता और विस्तार में कई बाधाएं होंगी। यही कारण है कि द्वैतवाद वाली सोच शोध कर्ता को उचित वातावरण प्रदान नही करती और इसके इतिहास में अनेक उदाहरण भी हैं।

4.1 शोधकर्ताओं के लिए उपाय

स्वामी विवेकानंद जी ने कल्पना की थी कि वेदांता जो अद्वैता प्रसंग का अध्ययन कर रहा है, शोध कर्ताओं को रास्ता दिखाने का रास्ता है। यही कारण है कि उन्होंने जोर दिया कि वेदांत को जंगल से निकाल कर प्रत्येक और हर किसी के दरवाजे पर लाया जाना चाहिए ताकि हर किसी की क्षमता में बेहतर तरीके से खोज की जा सके। वेदांत में अद्वैत की अवधारणा मास्टर और अनुशासन (गुरु, शिश्या) परम्परा के माध्यम से गुप्त रखी गई थी और द्वैतवाद अवधारणा के विरोध के कारण इसे लोकप्रियता नहीं मिली। सार्वजनिक जीवन में छिपी विचारधारा लाने के लिए भगवान बुद्ध और बाद में शंकराचार्य के लिए धन्यवाद।

उच्चतम बौद्धिकता के साथ सबसे महान दिल का संयोजन आज की बड़ी जरूरत है । दूसरे शब्दों में अनंत प्रेम और अनंत ज्ञान के संयोजन और दोनों को वेदांत अवधारणाओं के माध्यम से आसानी से हासिल किया जा सकता है।

आम तौर पर दोनों (प्रेम और बुद्धि ) आधुनिक शिक्षा के किसी भी माध्यम से एक साथ आगे नहीं बढ़ सकते हैं। उदाहरण स्वरूप आधुनिक शिक्षा बुद्धि (आई -क्यू) में तो वृद्धि प्रदान करती है लेकिन प्रेम (ई-क्यू ) की वृद्धि करने में पिछड़ जाती है। यही कारण है कि गहराई से शोध कर रहे वैज्ञानिकों में सहनशीलता, स्वीकृति और प्रशंसा आदि की भावनात्मक पहलुओं पर प्राय कमी पाई जाती है। जब तक दूसरो के प्रति इन भावनात्मक पहलुओं पर वृद्धि नही होगी तब तक शोध कार्यो में पुनरावृति का प्रचलन चलता रहेगा और खोज का आदान-प्रदान बहुत गम्भीरता पूर्वक और खुला नहीं होगा। “वांछित परिणाम प्राप्त करने के लिए आई-क्यू और ई-क्यू दोनों में सामंजस्य कैसे बनाया जाए ?”- वेदांत इसी का समाधान प्रदान करता है।

वेदांत इन गुणों को देता है, (i) अनंत अस्तित्व ( सत ) (ii) अनंत ज्ञान (चित ) और (iii)अनंत आनंद। ये सभी एक ही हैं। सत , चित और आनंद , परमात्मा के कारण ही है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि परमात्मा के तीन ज्ञानक्षेत्र – सर्वशक्तिमान , सर्वज्ञ और सर्व-भूत हैं। किन्ही भी साधनो से इन ज्ञान क्षेत्रो की खोज मानव की भलाई के लिए की जाती रहनी चाहिए। वेदांत मानव जाति में मौजूद शुद्धिकरण और संचारण की सहायता से परमात्मा के उन ज्ञानक्षेत्रो (शक्ति, ज्ञान और आनंद ) का आभास कराकर समाधान प्रदान करता है।

इससे स्पष्ट होता है कि बिना ज्ञान और प्रेम के अस्तित्व , बिना प्रेम के ज्ञान और बिना ज्ञान के प्रेम नही हो सकता। वेदांत स्पष्ट करता है कि ज्ञान और अस्तित्व में आपस संतुलन बनाकर आनंद को प्राप्त किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में वैज्ञानिक दृष्टि से आनंद ही चेतना है, अस्तित्व ही ऊर्जा है और ज्ञान ही अंतरिक्ष है। जब तक ऊर्जा और अंतरिक्ष में संतुलन नही हो जाता, चेतना को नही खोजा जा सकता। ऊर्जा,अंतरिक्ष

,चेतना का समग्र दृष्टिकोण केवल भौतिकवादी दुनिया में नई रचना का कारण बन सकता है। यही कारण है कि स्वामी विवेकानद ने वैदांतिक अवधारणा पर जोर दिया है और योग में वर्णित उचित दृष्टिकोण के माध्यम से इसका अभ्यास किया जा सकता है।

5. कैसे अद्वैत धर्म को घेर सकता है?

भगवान और पैगम्बर के दूतो ने उस समय आवश्यक सुधार के विचार को ध्यान में रखते हुए धर्म की बुनियादी अवधारणा को प्रस्तुत किया है। सभी धर्मों के मूल ग्रंथ मानव के शारीरिक और मानसिक बल के बीच सामंजस्यपूर्ण रूप से संतुलन के द्वारा “संपूर्णता की प्राप्ति ” पर जोर दे रहे हैं।

मौजूदा धर्म पूर्णता को प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह अद्वैत द्वारा पूरा किया जा सकता है। अद्वैत का द्वैतवादी अवधारणा से कोई झगड़ा नहीं है। अद्वैत द्वैतवादी अवधारणा का समर्थन करता है बशर्ते उच्चतम नैतिक मूल्य का पालन किया जाए ।

नैतिकता द्वैतवादी दृष्टिकोण के सकारात्मक पहलुओं यथा स्वाभाविक रूप से उपलब्ध संसाधन को अधिक तर्क और मानसिक दृष्टिकोण डाले बिना घेर लेगी । इससे द्वैतवादी दृष्टिकोण के अनुयायी अधिक तर्कसंगत और उदार होंगे। लेकिन स्वार्थी होने की मानव कमजोरी के कारण यह हासिल करना कठिन है।

अद्वैत कहता है कि वह (परमात्मा ) निकटतम है। वह सभी के साथ एक ही रूप में विद्यमान है। अद्वैत कहता है कि परमात्मा हर शरीर के प्रत्येक भाग में प्रोटोप्लास्म के रूप में विद्यमान है और सभी के निकटतम है। साथ ही मानव कोशिकाओं में मौजूद होने के कारण, मानव शरीर का गठन सामान्य ज्ञान में अद्वैत की एकता अवधारणा को इंगित करता है।

आवश्यकता है तो केवल अस्तित्व, ज्ञान और आनंद की सद्भावना की उपस्थिति की। यही हमारा ध्येय होना चाहिए।इसे प्राप्त करने के लिए, संकल्पना ही आत्म की पूर्णता है। अगर हम अपने शरीर की संरचना का विश्लेषण करते हैं तो हम पाते हैं कि इसमें बायां लोब, दाहिना लोब और रीढ़ की हड्डी विद्यमान है और ये दैनिक दिनचर्या के लिए स्थाई संरचना का निर्माण करते हैं। अद्वैत की “अस्तित्व, ज्ञान और अनंत आनंद ” अवधारणा शरीर संरचना के कार्य के अनुरूप है, बशर्ते वे शुद्ध, ऊर्जावान और एकीकृत हों। इसे ,आत्मा जो मानव जाति के लोब से संयोजित है एवं रीढ़ की हड्डी के माध्यम से कार्यशील है ,में पूर्णता प्राप्त करके ही हासिल किया जा सकता है।

6. सार्वभौमिक धर्म की आवश्यकता

20 वी शताब्दी वैज्ञानिक विकास का युग था और इसमें अनेक आविष्कार हुए हैं। वैज्ञानिक आविष्कारों का यह वरदान सृष्टि के लिए बहुत लाभप्रद है। वैज्ञानिक खोजों के वरदान से जुड़े प्रतिबंधों का सामना नहीं किया गया है। दुनिया में विभिन्न क्षेत्रो के विचारक इन के समाधान के लिए प्रयासरत हैं। वैज्ञानिक आविष्कारों के वरदानो से जुडी समस्याओं के समाधान के लिए योग भी एक साधन है।

वैज्ञानिक विकास के प्रतिबंधों के साथ-साथ वेदांत की अवधारणा को प्रसारित करने के लिए 21 वीं शताब्दी में वैदांतिक अवधारणा और योग एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करते है। दोनों (योग और वेदांत) एक साथ सभी के लिए विशेष तोर पर वैज्ञानिको और आध्यात्मिक गुरुओं के लिए एक सार्वभौमिक धर्म के रूप में एक आम मंच बना सकते हैं।

यह दर्शन एक ऐसे ईश्वर का उपदेश देता है जो सृष्टि से परे है। अगर हम सार्वभौमिक धर्म की तलाश करते हैं तो अद्वैत की अवधारणा सभी को अपील करती है। धर्म केवल पथ से ही नहीं बना होना चाहिए बल्कि हमेशा उनका कुल योग होना चाहिए और धार्मिक विकास के सभी दृष्टिकोणों का समावेश होना चाहिए। वैदिक दर्शन से पता चलता है कि सृष्टि से परे भी एक देवता है जो प्रकृति और ब्रह्मांड का नियंत्रक है। प्रकृति ही परमात्मा की आकाश , ऊर्जा और आत्मा के रूप में सहायता लेते हुए सृष्टि की वास्तविक प्रबंधक है। सर्वोच्च वास्तविकता सृष्टि से परे भगवान के रूप में भी जाना जाता है। सार्वभौमिक धर्म (वेदांत और योग ) आकस्मिक, सूक्ष्म और सकल शरीर और विकास के दौरान प्राप्त अनुभव के कारण ही कुछ बताता है ।

विज्ञान कहता है कि सभी चीजें ऊर्जा की ही अभिव्यक्ति है और जो कि सभी चीजों का योग है। मानवता की प्रवृत्ति सदैव स्वतंत्रता की ओर रहती है न कि बंधन की ओर। विज्ञान वास्तव में प्रकृति के माध्यम से पूर्ण वास्तविकता के प्रकटीकरण की अवधारणाओं का समर्थन करता है जो कि संतों द्वारा माना जाने वाला ऊर्जा का कुल योग है। इस ऊर्जा से अभिव्यक्ति स्वाभाविक रूप से ऊर्जा से घिरे अस्तित्व के रूप में उभरती है। जबकि विकास प्रक्रिया में मानव अस्तित्व आखिरी है। संतो ने यह भी पाया है कि मनुष्य जाति (विकसित होने का अंतिम चरण ) अब स्वतंत्रता के लिए विकसित हो रही है।

प्राचीन भारतीय ज्ञान आध्यात्मिकता और तर्क के माध्यम से, मन के अध्ययन के माध्यम से आगे बढ़ता है। पश्चिमी दुनिया बाहरी प्रकृति की बैशाखी पर खड़ी है और दोनों एक ही परिणाम पर आ रहे हैं। प्राचीन भारतीय ज्ञान और विज्ञान दृष्टिकोण में अंतर बहुत अधिक नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्राचीन भारतीय ज्ञान बाहरी प्रकृति की जांच के लिए मन की सहायता को जड़ के रूप में लेते हैं लेकिन विज्ञान बाहरी प्रकृति की जांच के लिए मन की सहायता को चैतन्य के रूप में लेते हैं।

7. महात्मा बुद्ध द्वारा कैसे अद्वैत पर विचार किया गया?

अद्वैत अवधारणा बुद्धि के ज्ञान क्षेत्र के साथ ही प्यार (दया , करुणा , क्षमा ) के ज्ञान क्षेत्र का विस्तार करती है। भगवान बुद्ध ने अपने समय में वेद पर आधारित सनातन धर्म के पिछड़े, उपेक्षित परिदृश्य को देखा है। उस समय द्वैतवादी अवधारणा के हावी होने के कारण जनता बहुत उलझन में थी, इस कारण वह भौतिकवादि भी हो गई थी। लोगों के बीच स्वाभाविक रूप से स्वार्थपन मानसिक विकास के लिए प्रमुख बाधा थी। महात्मा बुद्ध ने ऐसे भौतिक वाद का समाधान निकाला।

अद्वैत पर बुद्ध अवधारणा कार्य करती है। अद्वैत भौतिकवाद से बचाता है। बुद्धवाद ने अद्वैत दृष्टिकोण के संकीर्ण संघर्ष से आम जनता का बचाव किया। आम जनता में दया ,करुणा , क्षमा की भावना आ गई थी जिससे वे अपने आप को सुखी महसूस कर रहे थे। क्षमा भावना ही बुढ़वाद की सबसे बड़ी पहचान रही है। इससे जनता के व्यवहार में नम्रता आई और निस्वार्थी बने।

अद्वैत अवधारणा के प्रति अज्ञानता के कारण बुद्-वाद का पतन होने लगा। यद्यपि महात्मा बुद्ध ने बुढ़वाद पर अपनी खोज के बारे में जनता में खूब प्रचार किया लेकिन जनता में अद्वैत के बारे में सम्पूर्ण ज्ञान नही था। उसी समय बौद्ध धर्म में भी अनेक शाखाएं हो जाने के कारण जनता उलझन में रहने लगी।

आगे व्याख्या करने पर यह तथ्य भी सामने आया कि बौद्ध धर्म द्वारा दुनिया में “कोई भगवान् नही “ कोई शासक नही “ की शिक्षा दी गई। इससे अज्ञानी जनता ने अपने भगवान् , देवता हासिल कर लिए और इससे भारत में बौद्ध धर्म के विरुद्ध हलचल मचने लगी।

भारतीय संतों ने एक ही भगवान की पहचान करने वाली उसी अवधारणा की खोज की है लेकिन प्रकृति का ब्रह्मांड की सभी रचनाओं पर नियंत्रण है। इस अवधारणा को गुरु शिष्य व्यवस्था के कारण जनता ने स्वीकार नही किया और अलग रख दिया गया। इसी कारण अद्वैत

और बौद्ध धर्म की असली अवधारणा को भारत में कहीं भी स्वीकार नही किया गया। बौद्ध धर्म और अद्वैत अवधारणा के लक्ष्य और उनकी दूरदर्शिता का प्रचार प्रसार करने के लिए बुद्धि-वर्ग उन की सहायता प्राप्त नही कर सके।

वर्तमान बुद्धिवर्ग को महात्मा बुद्ध के हृदय जो अपार दया ,करुणा क्षमा से भरपूर है ,में शामिल होने की आवश्यकता है। यह संयोजन हमें उच्चतम स्तर का दर्शन प्राप्त कराएगा। बुद्ध धर्म दया, करुणा ,क्षमा पर आधारित है और यह हमारे हृदय के विकास के लिए मजबूत आधार प्रदान करता है। बुद्धवाद के मामले में “बुद्धि” भाग बहुत अधिक निहित नहीं था। बुद्ध धर्म में सबसे अच्छे संभावित गुण होने के बावजूद ,बुद्धिवर्ग द्वारा इस धर्म को न अपनाने का यह भी दूसरा बड़ा कारण हो सकता है। शंकराचार्य ने इस बेमेल गति को देखा और आम आदमी और बौद्धिक वर्ग के दिमाग और दिल को बराबर करने के लिए आवश्यक कदम उठाए।

7.1 बुद्ध और शंकराचार्य की अद्वैत पर अवधारणा

शंकराचार्य ने अद्वैत अवधारणा पर महात्मा बुद्ध द्वारा सुझाए गए सिद्धांतो की कमियों को अनुभव कर उन पर विचार किया। यही कारण है कि उन्होंने महात्मा बुद्ध की अपेक्षा अद्वैत के बौद्धिक भाग पर अधिक बल दिया। महात्मा बुद्ध और शंकराचार्य के विचारो में से सर्वश्रेष्ठ विचारो को अपनाकर उनको संयुक्त रूप से एक मंच पर प्रस्तुत कर प्रकृति और उससे आगे की खोज की दिशा में करने का काम स्वामी विवेकानंद ने बखूबी निभाया है।

यह बात ध्यान देने योग्य है कि मनुष्य के मस्तिष्क का आधा बायां भाग बौद्धिक ज्ञान क्षेत्र को दर्शाता है और आधा दायाँ भाग दिल को दर्शाता है। अद्वैत अवधारणा के अंतर्गत योग अभ्यास करने से मस्तिष्क के इन दोनों भागो के विकास में वृद्धि होती है। इसी कारण से स्वामी विवेकानंद और वर्तमान के शोधकर्ताओं ने मनुष्य जाति के विकास के लिए अद्वैत अवधारणा को सबके सामने प्रस्तुत किया।

महात्मा बुद्ध ने अद्वैत अवधारणा के नैतिक पक्ष को जब कि शंकराचार्य ने बौद्धिक पक्ष को प्रस्तुत किया है। शंकराचार्य अवधारणा यदपि मानव के दिल , दिमाग के विकास के लिए कारक है , लेकिन वह बौद्धिक पक्ष पर अधिक बल देती है। इसका तात्पर्य यह बिलकुल नहीं कि वह मानव मस्तिष्क के दिल वाले भाग पर ऋणात्मक प्रभाव डालता है।

बौद्ध धर्म में सार्वभौमिक दिल और अनंत धैर्य है और इसने धर्म को व्यावहारिक रूप दिया और इसे हर किसी के दरवाजे तक पहुँचाया। उस समय बुद्धवाद से ऐसे बहुत लोग प्रभावित हो रहे थे जो उस समय प्रचलित कई सिद्धांतो की अवधारणाओं से घिरे होने के कारण उनसे छुटकारा पाने के लिए संघर्ष कर रहे थे।

बुद्ध ने द्वैतवादी भगवान और अपने को नास्तिक समझने वालो की कभी प्रवाह नही की। उन्होंने किसी देश के लिए आवश्यक उच्चतम नैतिक मूल्यों को स्थापित करने में गति प्रदान की। भगवान बुद्ध एकेश्वर वाद (प्रत्येक मनुष्य , समाज या पंथ के लिए एक ईश्वर ) के विरुद्ध थे ; यही कारण है कि उन्हें अनेक लोग नास्तिक भी कहते थे। वास्तव में उन्होंने धर्म के ऐसे शुद्धतम रूप को प्रस्तुत किया जो अद्वैत अवधारणा से मेल खाता था। जब भी कोई नैतिक मूल्य की बात आती है तब उनकी शिक्षा प्रकाश की एक किरण के समान समझी जाती हैं।

स्वामी विवेकानद ने परिकल्पना की थी कि सदभावना को एक तरफा विकास के रूप में नही लेना चाहिए। यदि बौद्धिक आदमी अपने मस्तिष्क का विकास चाहता है तो महात्मा बुद्ध के हृदय के साथ शंकराचार्य के ज्ञान को सबकी सदभावना से प्राप्त करना सम्भव है। पश्चिमी देशो के दृष्टिकोण को स्पष्ट करने के लिए ही स्वामी विवेकानंद जी ने लंदन में 1996 में अपना व्याख्यान दिया था।

8 . अद्वैत का महत्व

भारत के संतो ने सदैव समझा है कि प्रकृति ही मानव के सम्पूर्ण विकास के लिए सहायक है, विषेशकर मानव मस्तिष्क के विकास के लिए। यह सर्व विदित है कि प्रकृति ही हर सृजन में सहायक है।

संतों द्वारा अनुमान लगाया जाता है कि प्रकृति आम आदमी को वर्तमान पीढ़ी से दिव्य व्यक्ति तक लंबे समय तक विकसित होने में मदद कर सकती है बशर्ते वातावरण मिले। संतो ने यह भी पाया कि यदि योगिक विधि अपनाई जाए तो आत्म-प्राप्ति के लिए संभव सीमा तक मानव विकास हो सकता है। शंकराचार्य ने इसे देखा और दिल और बुद्धि को सुसंगत बनाने के लिए अद्वैत वेदांत के रूप में जानी जाने वाली अवधारणा का प्रचार किया।

जब बौद्धिक विकास की हद हो जाती है तो हम दुनिया के महान दिल को संकीर्ण सीमा में रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकते हैं और नही उन्हें विशेष रूप से वर्तमान में बने रहने के लिए मजबूर कर सकते हैं।

उन्होंने संकेत दिया कि आधुनिक शिक्षा निश्चित रूप से बुद्धि के विकास को प्रदान कर सकती है लेकिन इसे हृदय के विकास को बढ़ाने के बिना संकीर्ण ज्ञान क्षेत्र में नहीं छोड़ा जाना चाहिए। यही कारण है कि योगिक अवधारणा से संसार की समस्त समस्याएं हृदय और मस्तिष्क में आपस में संतुलन बनाकर हल की जा सकती हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि दाहिने भाग का बाएं भाग के विकास से संतुलन बनाकर संसार की अनेक समस्याओं को हल किया जा सकता है।

यदि अद्वैत अवधारणा का प्रयोग नहीं किया जाता है तो इसका यह तात्पर्य हुआ कि पशुवादी अवधारणा के माध्यम से वैज्ञानिक युग को पाषाण युग की ओर धकेला जा रहा है। शंकराचार्य ने यह विचार प्रस्तुत किया कि अद्वैत -वेदांत अवधारणा को प्रत्येक मनुष्य के घर के द्वार तक नही पहुंचाया गया तो बौद्धिक वर्ग का मानसिक विकास या तो रुक जाएगा अथवा उसका पतन हो जाएगा। बौद्धिक विकास में किसी भी प्रकार का पतन हमें पशु वृति की ओर धकेल सकता है। यह सर्व विदित तथ्य है कि मात्र निद्रा ,खाना ,पीना , प्रजनन और भय, पशुवृत्ति के चार लक्षण हैं।

महात्मा बुद्ध और अद्वैत के सिद्धांतो को न मानकर हम बौद्धिक वर्ग के नैतिक जीवन की हत्या कर रहे हैं। यही कारण है कि स्वामी विवेकानंद ने इस बात पर बल दिया कि द्वैतवादी सोच बुद्धिवर्ग की अनुभूति को प्रभावित कर उसका पतन करेगा।

8.1 अद्वैतवेदांत पर शंकराचार्य का दृष्टिकोण

शंकराचार्य ने मानव के मन अथवा मस्तिष्क उत्थान की तर्कसंगत अवधारणा को प्रस्तुत किया। उन्होंने उपनिषद की व्याख्या करते समय “तर्क “ अवधारणा को ग्रहण किया। स्पष्ट किया कि उपनिषद की आख्या में “तर्क ” को केवल तर्क तक सीमित न रक्खा जाए बल्कि स्पष्टीकरण का कारण बनना चाहिए। यही कारण है कि उपनिषद को स्पष्ट करने के लिए “ब्रह्म सूत्र “ नामक शास्त्र की रचना की गयी। ब्रह्म सूत्र “उपनिषद के बाद के बयानों और तर्क “ को जोड़ने के लिए आवश्यक मंच तैयार करता है। शंकराचार्य का यह एक क्रांतिकारी कदम रहा है।

शंकराचार्य ने इस प्रकार एक “तर्क संगत पूर्ण “ दर्शन को जन्म दिया। उपनिषद में तर्क बहुत ही अस्पष्ट हैं। लेकिन शंकराचार्य ने इन्हे बहुत ही सुसंगत और सुपष्ट रूप में प्रस्तुत किया। ” ब्रह्म सूत्र “ की रचना के बाद आम आदमी जो इसको पड़ना , समझना चाहते थे ,उनके लिए बहुत आसानी हो गई। उपनिषद सकल शरीर की ,सूक्ष्म शरीर की , विकासशील प्रक्रिया को ऊपर उठाने के लिए है। उपनिषद व्यक्ति को यथासंभव सीमा तक सहायता करता है ताकि साधक जीवन के मुख्य उद्देश्य को समझ सके और जड़ तक पहुंचने के लिए कैसे क्रमवत विकास हो सके।

शंकराचार्य में उपनिषद की हर अवधारणा पर तर्क की चमकदार रोशनी डालने की अपार बौद्धिक शक्ति है । ब्रह्म सूत्र में उन्होंने गहराई से स्पष्ट किया है कि तर्ककर्ता की अज्ञानता पूरी तरह से तर्क के प्रकाश में समाप्त हो जाती है।

स्वामी विवेकानंद ने कल्पना की है कि महात्मा बुद्ध ने अद्वैत दर्शन के नैतिक पक्ष पर बल दिया हैं जबकि शंकराचार्य ने दर्शन के बौद्धिक पक्ष पर बल दिया है। उनका कभी यह तात्पर्य नहीं था कि बुद्ध ने बौद्धिक भाग को पूरी तरह से छोड़ दिया है या शंकराचार्य ने नैतिक भाग को किसी भी तरह से छोड़ दिया है। स्वामीजी का विश्वास है कि यदि बुद्ध और शंकराचार्य की अद्वैत अवधारणा के विषय पर विचार किया जाता है तो यह अद्वैत वेदांत का अभिन्न अंग होगा जो वर्तमान युग के बौद्धिक वर्ग के लिए अधिक उपयुक्त है।

8.2 अद्वैत वेदांत पर स्वामी विवेकानंद के विचार

स्वामी विवेकानंद ने आत्मा के रूप में वेदांत को माना। उन्होंने बल दिया कि जब तक आत्मा की अवधारणा को समझा और जाना नहीं जाता छात्र, मछुआरे और वकील समेत आम आदमी अपने दिमाग के साथ-साथ जीवित रहने की शैली में उन्नति नहीं कर पाएगा।

संक्षेप में छिपी हुई दिव्यता को आत्मा के विषय को समझकर खोजा जा सकता है। स्वामी विवेकानंद दृढ़ता से इंगित करते हैं “जब तक हम यह नहीं समझते हैं कि हम अकेले आत्मा हैं , शरीर नहीं हैं, तब तक हमारी छिपी हुई दिव्यता को प्रकट और उपयोग नहीं किया जा सकता है।” यद्यपि यह कठिन प्रतीत होता है लेकिन हम में से प्रत्येक में छिपी हुई संभावित दिव्यता का पता लगाना बहुत आसान है।

स्वामी विवेकानंद ने वर्णन किया है कि प्रत्येक आत्मा अपने आप में दिव्य है। वाह्य और आतंरिक रूप से प्रकृति को नियंत्रित करके इस दिव्यता को प्रकट करना ही लक्ष्य है। कार्य या पूजा या मानसिक नियंत्रण या दर्शन में से किसी एक अथवा सब के द्वारा इसको करके स्वतंत्र हो जाएं। यही सर्व धर्म है। सिद्धांत या हठधर्मिता या धार्मिक संस्कार या पुस्तक या मंदिर या रूप बाद में आते है।

8.2.1 आत्मा को अनुभव करने की महत्ता

जब अग्नि चक्र में चेतना और ऊर्जा एक साथ हो तो आत्मा की अवधारणा को समझा जा सकता है। गर्दन क्षेत्र के ऊपर महानता और दिव्यता महसूस की जाती है। यही ज्ञान -क्षेत्र कहा जाता है। यह भक्ति क्षेत्र भी कहा जाता है। अगर चेतना को मणिपुरा क्षेत्र से ऊपर रखा जाता है तो व्यक्तित्व का पता लगाया जा सकता है। यह शरीर चेतना कहलाता है। इस क्षेत्र में किसी को अपने स्वयं के कर्तव्य को देखना चाहिए और आत्मा को विकसित करने के लिए दूसरों की रक्षा करना चाहिए। आत्मा के विकास के लिए किसी को अपने व्यवसाय को बदलने की आवश्यकता नही है अपितु उसे प्राणिक चक्र के उच्च स्तर पर दिमाग और ऊर्जा को दृष्टि में रखते हुए अपने व्यवसाय में पूरी रूचि से लग जाना चाहिए।इसी को दृष्टि में रखते हुए स्वामी विवेकानंद ने कहा है “ यदि विद्यार्थी , मछुवारा और वकील अनुभव करते है कि वे केवल शरीर नही हैं बल्कि वे आत्मा भी है , तो अपने व्यवसाय में और अधिक सफल हो सकते हैं। ” इसका तात्पर्य यह हुआ कि आत्मा के वास्तविक अर्थ जानने पर विद्यार्थी एक बेहतर विद्यार्थी , मछुवारा एक बेहतर मछुवारा और वकील एक बेहतर वकील बन सकता है।

8.2.2 स्वामी विवेकानंद द्वारा समर्थित दिव्यता का वैदिक विश्लेषण

वेदांत का दावा है कि मनुष्य या महिला में दिव्यता प्रकट होने पर मानव प्रकृति में “अनंत एकता” की अभिव्यक्ति होती है। जब कोई ब्रह्मांड के साथ जुड़ा हुआ अनुभव करता है तो वह जाति , पंथ, भाषा, स्थान और धर्म की पकड़ में नहीं होगा। वह सभी के साथ एकता महसूस करेगा। एकता की अभिव्यक्ति प्रेम और सहानुभूति के संदर्भ में व्यक्त की जाती है जो बदले में व्यक्ति में नैतिक और सदाचारी मूल्य दर्शाता है।

एकता की यह अभिव्यक्ति दिव्यता का उच्चतम प्रकार है जिसको तुरंत प्राप्त नही किया जा सकता है। हालांकि रचनात्मकता, दयालुता, क्षमा, जागरूकता और दिन-प्रतिदिन के जीवन में सकारात्मक विचारों के विकास के लिए वैदांत और योगी विषय का अभ्यास करके दिव्यता को प्रकट करने के लिए लगाया जा सकता है। आत्मा की अनुभूति में वृद्धि के लिए दूसरा मार्ग है पंच कोष की शुद्धि का।

9 . वैज्ञानिक अवधारणा और वेदांत एक दूसरे के समीप कैसे है?

स्वामी विवेकानंद ने संसार के सामने स्पष्ट शब्दों में वर्णन किया है कि अद्वैत- वेदांत की प्रष्टभूमि में वैज्ञानिक और आध्यात्मिक गुरु का एक ही आम मंच है। इसके लिए उन्होंने जीवाणु सृजन की कार्य पद्दति की ओर संकेत किया है जब तक कि जीवित सृजन मानव चक्र तक नही पहुंच जाता है। स्वामी विवेकानंद की घोषणा के बाद ब्रिटिश जीव वैज्ञानिक थॉमस हेनरी ने उन्नीसवी सदी के मध्यांतर के अंत में डार्विन सिद्धांत का प्रचार किया। हक्सले द्वारा प्रदान की गई अवधारणा बिंदु पर वैदिक अवधारणा का समर्थन करती है जिसका स्वामी विवेकानंद ने अपनी वार्ता में उल्लेख किया है। यदि हम विज्ञान में जीवद्रव्य होने की अवधारणा और उपनिषद में बिंदु की अवधारणा की तुलना करें तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि एक सार्वजनिक मंच पहले से ही मौजूद है। शोधकर्ता को विस्तृत जानकारी के लिए अद्वैत की अवधारणा को जानना चाहिए।

9.1 शोधकर्ता को अद्वैत (वेदांत ) की क्यों आवश्यकता है ?

द्वैतवादी दृष्टिकोण जब भी और जहां भी संभव होता है , सामान्य ज्ञान अनुप्रयोग, मृत्यु का प्राकृतिक उपाय का मार्ग प्रशस्त करता है।

इसका मतलब है कि मस्तिष्क का ऐसे स्थान पर कोई प्रयोग नही है जहां हमें अपने सोचने वाले ज्ञान क्षेत्र को फैला देना है अथवा अगले बेहतर समाधान को खोजने के लिए संघर्ष करना है।यह आम आदमी की प्रकृति में और बौद्धिक और शोधकर्ताओं के दिमाग में भी बैठ गया है। इस तरह खोज की वृद्धि को यथा स्थिति में खड़ा रहने दिया गया।

शोध कर्ताओं ने पाया कि पुराना द्वैतवादी खोज की गहराई में जाने के लिए उनकी मदद नही करता है। प्रारम्भ में शोधकर्ता के पास अन्य कोई विकल्प नही रहता क्योंकि वह सोच के ज्ञान क्षेत्र में ठहराव की स्थिति में होता है। द्वैतवादी दृष्टिकोण के कारण धार्मिक पंथ की आस पास की अवधारणा भी पक्ष में नही थी। महात्मा बुद्ध और शंकराचार्य जैसे महान संतो ने इसके समाधान की कल्पना की। विशेषकर शंकराचार्य ने पाया कि वेदो में अद्वैत वेदांत के रूप में इसका वर्णन किया हुआ है।

अद्वैत बौद्धिक और मानसिक क्षेत्र के विषय में शोधकर्ताओं से सहमत है। अद्वैत आत्मा से संबंधित विज्ञान है जो शारीरिक शक्ति और मानव की मानसिक शक्ति के लिए आश्रय बिंदु है। यह दर्शाता है कि भौतिक और मानसिक शक्ति का संतुलन ही आत्मा को बांधे रख सकता है। यह ,यह भी स्पष्ट करता है कि भौतिक और मानसिक शक्ति के एकीकरण से ही आत्मा रुपी शक्ति प्राप्त होती है।

धर्म की कमजोरियों अथवा द्वैतवादिता का परित्याग कर देना चाहिए। यह इसलिए है क्योंकि यह विश्व भर में प्रचलित है और धर्म की वर्तमान अवधारणा आत्मा के विकास में बाधक है। अद्वैत वेदांत की आध्यात्मिक शक्ति से निपटने के लिए द्वैतवादी अवधारणा एक बहुत बड़ी बाधा है। द्वैतवादी दृष्टिकोण मानव प्रणाली के भौतिक पहलू को तो अधिक से अधिक शुद्ध कर सकता है लेकिन बुद्धि के विकास में कम से कम ही सहायक है।

अद्वैत में द्वैतवादिता नही है बल्कि एकता है और अवैयक्तिक ईश्वर के विचार बुद्धिजीवी पर स्थायी पकड़ रखेगा। अद्वैत और एकात्मकता में गहरा संबंध है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि जब तक आत्मा का अनुभव नही हो जाता तब तक द्वैतवादिता से निकटता बनी ही रहेगी । जब आत्मा के ज्ञान की जानकारी होती है तब समग्रता के माध्यम से अभिन्न दृष्टिकोण हासिल किया जा सकता है और यह बौद्धिक की निरंतरता के लिए दिमाग का विस्तार करेगा।

9.2 पश्चिमी जगत में अद्वैत की आवश्यकता

स्वामी विवेकानंद ने लंदन में दिए गए अपने व्याख्यान में पश्चिमी जगत को अद्वैत की महत्ता से अवगत कराया। ऐसा इसलिए है क्योंकि पश्चिमी जगत में वैयक्तिक भगवान की अधिक महत्ता है जब की अद्वैत सिद्धांत में अवैयक्तिक भगवान (सृष्टि से परे ) की ओर अधिक बल दिया गया है। जब तक वैयक्तिक भगवान को अवैयक्तिक भगवान से नही बदल दिया जाता, जब तक कि व्यक्तिगत ईश्वर की अवधारणा पूरी तरह से अवैयक्तिक देवता द्वारा प्रतिस्थापित नहीं की जाती है तब तक मौजूदा क्षमता और दिमाग के आंतरिक विकास को बढ़ने या विस्तार करने के लिए स्वतंत्र नहीं किया जा सकता है।

अद्वैत को यूरोप और अमेरिका में अपना आधार बनाने के लिए प्रचलित धर्म की अवधारणा का विश्लेषण और परिवर्तन आवश्यक है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि प्रचलित धर्म का किसी भी साधन से परिवर्तन आवश्यक है ताकि मानसिक प्राण या आंतरिक दिमाग पर बाध्यकारी बल मुक्त हो सके। आध्यात्मिक संतो के अनुसार ऐसा परिवर्तन योगिक क्रियाओं से संभव है। दूसरा उपाय है – दिमाग में नियमा और यमा की कुछ परम्पराओं की गहरी छाप छोड़ना। नियम और आचरण से संबंधित नारे का उन्नत रूप इस संबंध में सहायक होगा।

प्लूटो का कहना है कि मनुष्यो में प्रेरणा कविता के माध्यम से आती है। भारतीय संतो के साथ भी ऐसा ही हुआ है। उन्होंने उपनिषद को कविता की भाषा में प्रतिपादित किया। प्लूटो यूनान में 400 ईसा पूर्व पैदा हुए थे। वह पश्चिमी दार्शनिक और प्लुटोनिस्म का समर्थक था। उसने अनुभव किया कि किसी भाषा के प्रवचन का कविता -स्वरूप मनुष्यो के दिमाग पर अधिक प्रभाव दाल सकता है। प्राचीन काल में भारतीय संतो जिन्होंने उपनिषद को कविता -स्वरूप में प्रतिपादित किया, के भी यही विचार थे और इसी प्रथा को गुरु- शिष्य परम्परा में भी जारी रक्खा।

बुद्धिजीवियों के लिए उपनिषद की कविता रूपी भाषा का प्रयोग करने के लिए और उसका प्रभावी परिणाम प्राप्त करने के लिए एक प्रयास की आवश्यकता है ताकि वे आंतरिक मन की सीमाओं को अधिक क्षेत्र में पुनर्स्थापित कर सके। जब इस प्रकार का अनुकूल वातारण प्राप्त हो जाता है तो विज्ञान और धर्म आपस में मिलकर हाथ मिलाते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि उपनिषद -कविता बुद्धिजीवियों का मित्र बनकर अन्वेषण के मंच के रूप में कार्य करने लगेगी।

उपनिषद की कविता रूपी भाषा में अद्वैत की अवधारणा (वर्तमान में वेदांत के रूप में) विद्यमान रहती है। शंकराचार्य ने उपनिषद के बहुत महत्वपूर्ण पहलू को तैयार किया है और बौद्धिक वर्ग के उपयोग के लिए प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि स्वामी शंकराचार्य ने अद्वैत के उपयोगी पहलु को प्राप्त करने के लिए इस विषय पर अधिक बल दिया है।

“किसी के मत को बाधित न करना” विशेषकर ऐसे मनुष्यो जो अनजान हैं और पूजा के निम्न स्तर से बंधे हुए हैं ,के धर्म प्रचार की दृढ़ता ही अद्वैत की महिमा है। यही कारण है कि उच्चतर से उच्चतर अद्वैत सभी मानव जाति की सहायता करता है।

9.3 अद्वैत (वेदांत )और वैज्ञानिक अनुशंधान में किस सीमा तक समानता है ?

वैज्ञानिक और आध्यात्मिक गुरु को टिकाऊ दृष्टिकोण के लिए एक आम मंच की जरूरत है। ऐसा केवल तभी सम्भव है जब वैज्ञानिक के द्वारा की गई खोज उपनिषद की अवधारणा का समर्थन करे। चित्र में वैज्ञानिक और आध्यात्मिक अवधारणा का संक्षेप में वर्णन किया गया है।

जब वैज्ञानिक दावा करता है कि चीजें एक बल का प्रकटीकरण हैं तो वे लक्ष्य तक पहुंच जाएगा । यही अवधारणा उपनिषद में नाभिक, बिंदु अथवा ईश्वर के रूप में पढाई जाती है। उपनिषद प्रकृति के माध्यम से ब्रह्मांड पर सर्वोच्च वास्तविकता के प्रकटन का वर्णन करता है। ब्रह्मांड पर महाबिन्दु के प्रमुख घटक शक्ति (प्राण और ऊर्जा ), शिव (चेतना , चित और अंतरिक्ष ) और बिंदू (नाभि और आत्मा ) हैं। इसी प्रकार मानव प्रणाली के सेलुलर तंत्र पर वैज्ञानिक खोज से पता चलता है कि सेल में कोशिका झिल्ली, साइटोप्लाज्म और नाभिक दोनों होते हैं और दोनों को विज्ञान के क्षेत्र में प्रोटोप्लाज्म (जीवद्रव्य ) के रूप में जाना जाता है। यही परिकल्पना आध्यात्मिकता पर होती है जहां प्रकृति (ऊर्जा ) और बिंदु (नाभिक ) दोनों मिलकर परमात्मा (सर्वोच्च वास्तविकता ) कहलाते हैं।

स्वामी विवेकानंद ने “सृष्टि में भगवान “और “सृष्टि से भगवान “ के अंतर् को पहचाना। उन्होंने वेद और उपनिषद के बीच में कोई अन्य देवता का उल्लेख नहीं किया है। एक बात यह है कि भगवान ब्रह्मांड के बाहर कहीं स्वर्ग में है (सृष्टि से परे ) और दूसरा वह अपनी आत्मा है और उसे दूर समझना उसका अपमान होगा। बिंदू के रूप में सर्वोच्च वास्तविकता की अभिव्यक्ति , अभिव्यक्ति की स्पष्ट तस्वीर प्रदान करती है।

9.3.1 उपनिषद एकात्मकता (अवैयक्तिक भगवान ) के विषय में वर्णन करते हैं

मानव की क्रमागत उन्नति के दौरान परमात्मा बिंदू के रूप में उतरता है , प्रवेश करता है और विभिन्न रूपों में हर सृजन में अभिव्यक्त होता है। इसका मतलब यह नहीं है कि विभिन्न रूपों में व्यक्त करते हुए सर्वोच्च वास्तविकता की आंतरिक क्षमता को कम क्षमता प्राप्त होती है। वेद के शक्तिशाली नारे ने सभी रचनाओं में व्यक्त महा बिंदू की अवधारणा का समर्थन करने के लिए “पूर्ण मेदह … पूर्ण मेवा यशिस्यते ” का वर्णन किया है।

चित्र उपनिषद के सार का संक्षेप में वर्णन करता है। उपनिषद बतलाता है कि अग्नि (शक्ति , बिंदु ) ब्रह्माण्ड में में प्रवेश कर विभिन्न रूपों में प्रकट होता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि एक आत्मा अनेक आत्माओं में प्रकट होती है और इसके अलावा भी असीम रूप से प्रकट होती है। इससे “सृष्टि में भगवान “ और “सृष्टि से भगवान “ के अंतर् का पता चलता है। अर्थात आत्मा और परमात्मा के बीच क्या अंतर् है इसका पता चलता है।

आध्यात्मिक गुरु को पता चलता है कि दिमाग के माध्यम से खोज करने पर हमें एकाग्रता, सार्वभौमिक, सब की आंतरिक आत्मा, सब का सार और वास्तविकता सब कुछ नि: शुल्क और आनद पूर्वक प्राप्त होता है।

यही मानव के दिमाग की शुद्धतम अवस्था है। मनुष्य का दिमाग ही परमात्मा द्वारा उसे प्रदान किया गया अमूल्य उपहार है। मानव के अतिरिक्त अन्य प्राणी को यह उपलब्ध नही है। यह मेरे पास एक ही राज्य प्राप्त करने के लिए उसे समझने के लिए सर्वोच्च ईमानदारी द्वारा उपहार दिया गया है। मानव जाति को यह उपहार इसलिए दिया गया है कि ताकि वह भी उसके समान सत, चित, आनंद की स्थिति प्राप्त कर सके।

“अमृत बिंदु उपनिषद” नामक उपनिषद दिमाग की शुद्धतम स्थिति को प्राप्त करने की विधि को दर्शाता है। योगा में इसे “बिंदु विशाग्रा “ जो सिर के पिछले वाले हिस्से में उपस्थित है , के रूप में वर्णन किया गया है।

समाप्त

 

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